गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

सरद ऋतु

सुघर चहकत हे चिरई -चिरगुन।
सरद ऋतु आगे मन होगे बिधुन।

बरसा देथे जब आँखी मूंद।
गिरथे अमरित ओस के बूंद।
हिलोर जाथे हिरदे मिलथे सुकून।

अनपूरना ह हरियर होगे।
चंदा ह घलो फरियर होगे।
तब गावय किसान ददरिया के धुन।

पुरइन के सुघर फूल-पाना।
सरद ऋतु के हरय अगुवाना।
मंडरावय भौंरा संग मधुर गुनगुन।

जइसे महत्ता हे साग म नून।
धरम करम जिनगी म पून।
मनखे अस त मोर बात ल गुन।
सरद ऋतु आगे मन होगे बिधुन।

                पवन नेताम "श्रीबासु"
सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम(छ.ग.)