पागा कलगी बर मोर तुच्छ रचना कृपया स्वीकार करव
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छत्तीसगढ़िया रे किसान, हमर माटी के मितान।।
खेती करव रे किसान, हमर भुईंया के भगवान।।
धरव नांगर धर तुतारी, खेत डाहर जावव।
धरती दाई ल रिझा के, हरियर लुगरा ल पहिरावव।।
धरौ मन म धियान, तुमन हरव ग सुजान,छत्तीसगढ़िया रे
आनी बानी के पेड़ लगावव, हमर माटी ल सुंदरावव।
आक्सीजन ल बुलाके,परदूषन ल भगावव।।
चलौ करव रे सरमदान(श्रम),तभे मिलही रे बरदान
छत्तीसगढ़िया रे किसान..
विदेशी खातू ल छोड़के, सवदेशी ल अपनावव।
माटी ह बिमार होवतहे,ईलाज ल करावव।
बढ़िया उगही जावा धान,आहि नवा रे बिहान छत्तीसगढ़िया रे..
तुहर किसानी करे ले भैया,जग संसार ह पाथे।
तुहरे ल खाके नेता, तोही ल गुरराथे।
देखावव अपन स्वाभिमान, बाढ़ही तुहर सम्मान छत्तीसगढ़िया रे किसान, हमर माटी के मितान।।
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रचना- पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी स/लोहारा
कबीरधाम
14.07.2016
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