रविवार, 10 सितंबर 2023

कहानी

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           *🔸सामाजिक बनीये...!🔸*

*एक चूहा एक कसाई के घर में बिल बना कर रहता था।*

*एक दिन चूहेने देखा कि उस कसाई और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है । उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी।*

*ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतरको यह बात बताई कि, घर में चूहेदानी आ गयी है।*

*कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?*

*निराश चूहा ये बात मुर्गेको बताने गया । मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है।*

*हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।*

*उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था। अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस कसाई की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।*

*तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने हकीम को बुलवाया। हकीम ने उसे कबूतरका सूप पिलाने की सलाह दी।*

*कबूतर अब पतीले में उबल रहा था।*

*खबर सुनकर उस कसाई के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन उसी मुर्गे को काटा गया।*

*कुछ दिनों बाद उस कसाई की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो बकरे को काटा गया।*

*चूहा अब दूर जा चुका था, बहुत दूर ……….।*

*🔸अगली बार कोई आपको अपनी समस्या बतायेे और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा सोचिये।*

*🔸समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा समाज व पूरा देश खतरे में है।*

*🔸अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये। स्वयं तक सीमित मत रहिये। सामाजिक बनिये ।*
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मुक्तक

एक दिवाना हूँ दिल को निकाल रख दूंगा।
मिले जो दिल तो दिल को सम्हाल रख लूंगा।
रगो मे बह रही है खून सिर्फ तेरे प्यार की,
यकीं नहीं  तो  वो  भी निकाल रख दूंगा।

चुराता हूँ नजर जब जब तू मेरे पास होती है!
मगर दिनरात इन नजरों को तेरी प्यास होती है!
मैं शर्मीला हूँ कह पाता नही लेकिन मेरी जानम,
खुदा से बस तेरे ही नाम की अरदास होती है!!

मेंरे चिट्ठी को पढ़कर वो वहां जब मुस्कुराती है !
हवा तब-तब मेरे कानों में आकर गुनगुनाती है!
मुझे यादों से उसकी एक पल फुर्सत नही मिलती,
मैं सो जाता हूँ पर ख्वाबो में वो मुझको सताती है!!

रामसेतु सी प्रेम की निशानी नही देखी !
राधाकृष्ण सी प्रेम की कहानी नही देखी !
खुद के लिए नही देश के काम आई जो,
भगत सिंह सी आजतक जवानी नही देखी!!

प्रेम  पावन है मैं तुमको एक दिन ये बताऊंगा।
हृदय मंदिर में एक दीपक प्रेम का मैं जलाऊंगा।
प्रेम पाना नही है त्याग है मीरा- राधा से सीखो तुम,
मैं उनकी दास्ता आकर तुम्हें इकदिन सुनाऊंगा।

सहेलियों के पीछे छुप-छुप, के वो दीदार करती थी।
मेरे काँलेज की थी लड़की,जो मुझसे प्यार करती थी।
किसी भी मोड़ पर उनसे, कही हो जाता जो तकरार
तो झुकी नजरों से अपने प्यार का, वो इजहार करती थी
               पवन नेताम 'श्रीबासु'
                कबीरधाम (छ.ग.)


बाली चाँदी के थे सोने का दाम क्यो लिखा।
हुआ ही नही था प्रेम तो अंजाम क्यो लिखा।
गर है जरा भी नही मुझ नाचीज़ से दिल्लगी,
तो छुप-छुप के मेंहदी से मेरा नाम क्यो लिखा।
                    पवन नेताम 'श्रीबासु'

मेहनत करते रहो नाम हो जायेगा

🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸

मेंहनत करते रहो एक दिन नाम हो जाएगा।

मनचाहा तुझको हासिल मुकाम हो जाएगा।


रंजिश भरी इस जमाने मे घुल न जाना तुम,

आग सी फैलती बाते है बदनाम हो जाएगा।


तिमिर चिर रौशन कर जमी को रवि बनकर,

बदल दे आलम खुशनुमा अंजाम हो जाएगा।


तमन्ना ए ता उम्र आसमां मे उड़ने का रक्ख,

ए हौसले दुनियाको सबब पैगाम हो जाएगा।


खुवाईश तेरी नीलामी की मोल रखते है जो,

उनकी हर जमीर खुद  नीलाम हो जाएगा।


रख यकीं अपने हौसले पे वफा ही करेंगे'पवन',

तू सोना -चाँदी कोहिनूर के दाम हो जाएगा।


                  *पवन नेताम 'श्रीबासु'*

           *सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम*

भोले जी के सजत हे बरात

भोले जी सजत हे बरात , सजावय भूत पिशाच,
'के देवता सब हासय रे..'-2
के देवता सब हासय रे,-2 
कैलाश म..-2 भीड़ लगे हे अपार,भूत परेत दिखय झार, 
के देवता सब..


काने म पहिरावय बिच्छू के बाला,नर मुंडन के पहिरै माला।
चुपरे हावय अंगे भभुतिया, कनिहा पहिरै मृगन के छाला।
जनेऊ बने हे..-2 गौहा डोमी साँप, दुजे के चंदा चमके माथ
के देवता सब हासय रे..


बिना मुड़ी के भुतवा राजा, गदकावत हे गुदुम बाजा।
चटिया मटिया टिमकी दफड़ा, कहा पाबे भैया उहा झगड़ा।
सौरा भौरा ह..-2 सातो राग मिलाये, परेतवा देवय ताल बजाये,
के दुम दुमी बाजा बाजय रे..


रक्सीन टुरी गाना गावय, झिथरी परेतिन नाच दिखावय।
किसम किसम के नाच गाना, बुढ़वा नंदी के गोड़ थिरकाना।
घुघवा देवता..-2 पइसा ल उड़ाये, उछल मंगल सब मनाये
के देवता सब हासय रे-2
         

                  पवन नेताम 'श्रीबासु'
          सिल्हाटी, स/लोहारा, कबीरधाम
                दिनांक- 21/01/2018

रामायण मंच के लिए

गति,सद्गति, दुर्गति

क्रमशः बड़ा
शारिरीक सुख,मानसिक सुख,बौध्दिक सुख,सत्ता का सुख,आत्मिक सुख

कथा सुने से
ताप,संताप,पाप कम होथे

भगवान मिले या न मिले मानव ल मानव से मिलना चाहिए

जीवन मे क्या करना है रामायण सीखाती है।
क्या नही करना है महाभारत...
जीवन को कैसे जीना है ये भगवतगीता सीखती है

मेरे राम आइये भगवान आइये
मेरे भोजन को भोग लगाइये।2।
मेरे भोजन को भोग लगाइये..मेरे..


वासना के प्रेरणा से माया को भक्ति मिलता है
वासना सुर्पनखा, माया रावण, सीता राम
भक्ति के दो भाग

एक बंदर के बच्चा के भाति (भययुक्त)
दूसरा बिल्ली के बच्चा (निश्चिंत)

पेट के नाम सदा जगजीता
संझा खाबे बिहनिया रीता


एक बार सीता जी ने प्रश्न किया राघव से
आचरण आपका ये समझ न आया है |

गृहभोज गुरु मुनि मात ने खिलाया किन्तु
श्रेष्ठ स्वाद शबरी के बेर का बताया है |

मायापति आपकी ये कौन सी है माया कहो
शिष्टाचार नाथ कैसा आपने निभाया है |

राम बोले प्रिये मैंने शबरी सा प्रेम भाव
व्यंजनों में किसी के न आजतक पाया है ||


तुलसी के मानस सेतु
            --------//------//-------
त्रेताजुग म सिरी रामचंद्र ह,
                 सागर म सेतु बनाय रिहिस|
बेंदरा भलुवा बानर सेना ल,
                 वो सागर पार कराय रिहिस||
ये कलजुग म तुलसीदास ह,
                  सुग्घर मानस सेतु बनाय हे|
दुनियाँ भर के नर नारी ल, 
                     भवसागर ले पार कराय हे||
सिरी राम के बनाय सेतु ह,
                        देखव समय चक्र म टूटगे|
ये तुलसी के बनाय सेतु म,
                       देख कतको मनखे ह जुटगे||
सिरिफ दु देश ह जुड़े रिहिस,
                         प्रभु राम के बनाय सेतु म|
देखव गाँव गाँव ह जुड़गे,
                           तुलसी के मानस सेतु म||
 बड़े-बड़े पथरा ल प्रभु ह, 
                     अपन रामसेतु म उफलाय हे|
ये तुलसी के मानस सेतु ह,
                           सब दुनिया ल तैराय हे||
वो रामसेतु ले बढ़के संगी,
                         ये तुलसी के मानस सेतु हे|
सब पढ़व अऊ सब तरव जी, 
                 मानस जनकल्याण के हेतु हे||
रचनाकार:- श्रवण कुमार साहू, "प्रखर".
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद

एक कंजूस भगवान की पूजा करना चाहता था पर कोई खर्च न हो महात्मा का उपाय मन से पूजा करो
(लोभ मे भगवान प्रगट हो गया)

ब्रह्मा की बेटी
कुमति सुमति 


राम नाम महिमा

राम नाम की महिमा | 

– कबीर पुत्र कमाल की एक कथा हैं। एक बार राम नाम के प्रभाव से कमाल द्वारा एक कोढ़ी का कोढ़ दूर हो गया। कमाल समझने लगे कि रामनाम की महिमा मैं जान गया हूँ। कमाल के इस कार्य से किंतु कबीर जी प्रसन्न नहीं हुए। कबीरजी ने कमाल को तुलसीदास जी के पास भेजा।

यह भी पढ़े –  रामनामी समाज – यहाँ पुरे शरीर पर लोग लिखवाते है राम नाम, आखिर क्यों?

तुलसीदासजी ने तुलसी के पत्र पर रामनाम लिखकर वह तुलसी पत्र जल में डाला और उस जल से 500 कोढ़ियों को ठीक कर दिया।

 
कमाल समझने लगा कि तुलसीपत्र पर एक बार रामनाम लिखकर उसके जल से 500 कोढ़ियों को ठीक किया जा सकता है, रामनाम की इतनी महिमा हैं। किंतु कबीर जी इससे भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कमाल को भेजा संत सूरदास जी के पास।

संत सूरदास जी ने गंगा में बहते हुए एक शव के कान में राम शब्द का केवल र कार कहा और शव जीवित हो गया। तब कमाल ने सोचा कि राम शब्द के र कार से मुर्दा जीवित हो सकता हैं। यह राम शब्द की महिमा हैं।

 
तब कबीर जी ने कहाः यह भी नहीं। इतनी सी महिमा नहीं है राम शब्द की।

भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।

 
जिसके भृकुटि विलास मात्र से प्रलय हो सकता है, उसके नाम की महिमा का वर्णन तुम क्या कर सकोगे?

राम नाम महिमा में एक अन्य कथा:
समुद्रतट पर एक व्यक्ति चिंतातुर बैठा था, इतने में उधर से विभीषण निकले। उन्होंने उस चिंतातुर व्यक्ति से पूछाः क्यों भाई! तुम किस बात की चिंता में पड़े हो?

 
मुझे समुद्र के उस पार जाना हैं परंतु मेरें पास समुद्र पार करने का कोई साधन नहीं हैं। अब क्या करूँ मुझे इस बात की चिंता हैं। अरे भाई, इसमें इतने अधिक उदास क्यों होते हो?

ऐसा कहकर विभीषण ने एक पत्ते पर एक नाम लिखा तथा उसकी धोती के पल्लू से बाँधते हुए कहाः इसमें मैनें तारक मंत्र बाँधा हैं। तू ईश्वर पर श्रद्धा रखकर तनिक भी घबराये बिना पानी पर चलते आना। अवश्य पार लग जायेगा।

विभीषण के वचनों पर विश्वास रखकर वह व्यक्ति समुद्र की ओर आगे बढ़ने लगा। वह व्यक्ति सागर के सीने पर नाचता-नाचता पानी पर चलने लगा। वह व्यक्ति जब समुद्र के बीच में आया तब उसके मन में संदेह हुआ कि विभीषण ने ऐसा कौन सा तारक मंत्र लिखकर मेरे पल्लू से बाँधा हैं कि मैं समुद्र पर सरलता से चल सकता हूँ। इस मुझे जरा देखना चाहिए।

उस व्यक्ति ने अपने पल्लू में बँधा हुआ पत्ता खोला और पढ़ा तो उस पर दो अक्षर में केवल राम नाम लिखा हुआ था। राम नाम पढ़ते ही उसकी श्रद्धा तुरंत ही अश्रद्धा में बदल गयीः अरे ! यह कोई तारक मंत्र हैं ! यह तो सबसे सीधा सादा राम नाम हैं ! मन में इस प्रकार की अश्रद्धा उपजते ही वह व्यक्ति डूब कर मर गया।

कथा सार: इस लिये विद्वानो ने कहा हैं कि श्रद्धा और विश्वास के मार्ग में संदेह नहीं करना चाहिए क्योकि अविश्वास एवं अश्रद्धा से ऐसी विकट परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं कि मंत्र जप से काफी ऊँचाई तक पहुँचा हुआ साधक भी विवेक के अभाव में संदेहरूपी षड्यंत्र का शिकार होकर अपना अति सरलता से पतन कर बैठता हैं। इस लिये साधारण मनुष्य को तो संदेह की आँच ही गिराने के लिए पर्याप्त हैं। हजारों-लाखों-करोडों मंत्रो की साधना जन्मों-जन्म की साधना अपने सदगुरु पर संदेह करने मात्र से नष्ट हो जाती है।

तुलसीदास जी कहते हैं-
राम ब्रह्म परमारथ रूपा।

अर्थात्: ब्रह्म ने ही परमार्थ के लिए राम रूप धारण किया था।

रामनाम की औषधि खरी नियत से खाय।
अंगरोग व्यापे नहीं महारोग मिट जाय ।।
🚩🚩🙏राम राम🙏🚩🚩

जाड़ / जय हो तोर नेट

जाड़ हा जनावत हे
बिहनिया ले डोकरा बबा कुडकुडावत हे
चिरइ चिरगुन पंख फड़फडावत हे
बडे बिहनिया झन उठीहा संगी
अब के जाड़ हा जनावत हे

दाई हा पनपुरवा बनावत हे
ददा मंद मंद मुचमुचावत हे
एति तेति झन गिंजरिहा संगी
अब के जाड़ हा जनावत हे

डोकरा बबा बिडी सुलगावत हे
डोकरी सरसों तेल कडकावत हे
आगी के तिर ले झन उठिया हा संगी
अब के जाड़ हा जनावत हे

भइसी बइठे पगुरावत हे
राउत ला भइसी लतीयावत हे
जाड मा झन नहाहू संगी
अब के जाड़ जनावत हे

भउजी लइका ला खिसियावत हे
लइका माटी मा नहावत हे
कातिक नोहाय झन जावा संगी
अब के जाड़ हा जनावत हे

“जय हो तोर नेट”

मोबाईल के जमाना हे, 
चलत हे भारी नेट! 
एकर चक्कर मा भात घलो, 
नइ खवावय भर पेट! जय हो तोर 

आठोकाल बारो महीना, 
आषाण सावन जेठ! जय हो तोर नेट

उठत बईठत रेंगत दउड़त, 
घंसत घंसत कोलगेट! 
नई छोड़न मोबाइल ला, 
भले काम मा जाये बर हो जय लेट! जय हो तोर

सब झन लगे हे मोबाईल मा, 
गरीब होवय चाहे सेठ! 
डोकरा बबा घलो हाथ उठाके, 
खोजथे मोबाईल मा नेट! 

कभू चढंहत हे अटरिया ता, 
कभू चढ़हत हे गेट! 
एकर चक्कर मा ले बर पडगे, 
मँहगा वाला हेंडसेट! 

जय हो तोर नेट! 

जय हो तोर नेट!


फरा बाटव , चिला बाटव , बाटव रे तमसई,
ठेठरि बाटव , खुरमि बाटव,बाटव रे मुर्रा लाई,

करमा गालव , सुवा गालव, गालव गित सवनाई
"#छत्तीसगढ़_राज_सिरजन_दिवस"के आप जम्मो संगवारी मन ला कोरी कोरी बधाई !!





बेटी की विदाई

बेटी की विदाई मे 

पिता भी रोता है पर
पिता जहां रोता है 
वहां कोई नही होता है

पिता जी जिम्मेदारी घर बाहर
माता की जिम्मेदारी घर के अंदर

घर का क्षेत्रफल छोटा है
पर बाहर का क्षेत्रफल बड़ा

बुधवार, 9 अगस्त 2023

महि तो आदिवासी अँव

*विश्व आदिवासी दिवस*
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
महि तो आदिवासी अँव,महि तो मूल निवासी अँव
बीरनरायन,बिरसा मुंडा,रामाधीन गोंड,चेंदरू बैगा
रानी दुर्गावती,गुंडाधुर अउ प्रवीरचंद के नाती अँव
महि तो............ !!

करमा,सरहुल,रेला,लैंजा गुरतुर
मांदर के सङ्ग उड़त हवै फुरफुर,
पागा कलगी सङ्ग ये गेंड़ी नाँचव
चिरई-चिरगुन के भांखा बाँचव !
मँय जंगल के रहवासी अँव........

कोदो,कुटकी,मड़िया अउ जुवांर
अमली,अंवरा,मउँहा के रखवार,
हर्रा,बहेरा,तेंदू,लाख,चार चिरौंजी 
बाघ,भालू सङ्ग खेलन मनमौजी !
मँय धनुषधारी बनवासी अँव.......

दवई गोंटी के ये हवय खज़ाना
कइसे का के संसो तंहि बताना,
माटी म उपजेन,माटी म बाढ़ेन
हम प्रकृति सङ्ग म रास रचायेन !
मँय बूढ़ादेव के दासी अँव..........

कतको ये मूल धरम ल बांटत हे
नवा- नवा देव बना के छाँटत हे,
सिधवा मन के करत हे सियानी
मेटे बर भिंड़े हे ये हमर कहानी !
मँय प्रकृति के घाँसी अँव...........

                --- राजकुमार 'मसखरे'
                       09/08/2023
भदेरा (पैलीमेटा/गंडई),जि-केसीजी (छ.ग.)

सोमवार, 31 जुलाई 2023

खुद के अंदर

खुद के अंदर अब इंसान कहा रखतें है।
इंसानियत के वो ईमान कहां रखतें  है।

वृद्धाश्रम मे रोते छोड़ आते  है माँ-बाप,
अब घरो मे पुराना समान कहा रखतें है।

फिजूल की वाहवाही रखती है दुनिया,
अब सच्चाई की जुबान कहाँ रखतें है।

अच्छे दिन का इंतजार कितनो को है,
अच्छे संस्कार का ज्ञान कहाँ रखतें है।

आजकल कितने मकां बनते है शहर मे,
प्रेम वाली वो रोशनदान कहाँ रखते है।

उम्र गुजर गई इस शहर मे बसर करतें,
सफेद बालो की पहचान कहाँ रखतें है।

                   पवन नेताम 'श्रीबासु'
              सिल्हाटी, कबीरधाम छ.ग.

बेटी बचाओ

बेटी खुशियों की होती छांव..भैया बेटी बचाओ
बेटी बचाओ भैया बेटी बचाओ-2  बेटी अंगना....

बेटी के बिना जग अंधियारा, सूना होगा ये जग सारा।
गर बेटे को तुम चाहते हो, बेटी को तो क्यों मारते हो।
बिना बेटी के बेटा कहा पाओ,

देखोगे सूनी कलाई, बिन बहना के राखी न भाई।
बेटा कलप कलप रोएगा, रक्षाबंधन मे न सोएगा।
तीजा-पोला को कैसे मनाओ,

बन गये कही कन्यादानी, नाम तुम्हारे सद्ग्रन्थ बखानी।
नवरात मे किसको जिमाओगे, नवकन्या ढूंढ न पाओगे।
चाहिए लक्ष्मी तो बेटी घर लाओ...

                पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम(छग)

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

छत्तीसगढ़िया हमर किसान

पागा कलगी बर मोर तुच्छ रचना कृपया स्वीकार करव
*******************
छत्तीसगढ़िया रे किसान, हमर माटी के मितान।।
खेती करव रे किसान, हमर भुईंया के भगवान।।

धरव नांगर धर तुतारी, खेत डाहर जावव।
धरती दाई ल रिझा के, हरियर लुगरा ल पहिरावव।।
धरौ मन म धियान, तुमन हरव ग सुजान,छत्तीसगढ़िया रे 

आनी बानी के पेड़ लगावव, हमर माटी ल सुंदरावव।
आक्सीजन ल बुलाके,परदूषन ल भगावव।।
चलौ करव रे सरमदान(श्रम),तभे मिलही रे बरदान
छत्तीसगढ़िया रे किसान..

विदेशी खातू ल छोड़के, सवदेशी ल अपनावव।
माटी ह बिमार होवतहे,ईलाज ल करावव।
बढ़िया उगही जावा धान,आहि नवा रे बिहान छत्तीसगढ़िया रे..

तुहर किसानी करे ले भैया,जग संसार ह पाथे।
तुहरे ल खाके नेता, तोही ल गुरराथे।
देखावव अपन स्वाभिमान, बाढ़ही तुहर सम्मान छत्तीसगढ़िया रे किसान, हमर माटी के मितान।।
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रचना- पवन नेताम 'श्रीबासु'
    सिल्हाटी स/लोहारा
          कबीरधाम
14.07.2016

गुरुवार, 29 जून 2023

बेटी

आज लड़कियों के एक विद्यालय में आई नई अध्यापिका बहुत खूबसूरत थी, बस उम्र थोड़ी अधिक हो रही थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी...

सभी छात्राएं उसे देखकर तरह तरह के अनुमान लगाया करती थीं। एक दिन किसी कार्यक्रम के दौरान जब छात्राएं उसके इर्द-गिर्द खड़ी थीं तो एक छात्रा ने बातों बातों में ही उससे पूछ लिया कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की...?

अध्यापिका ने कहा- "पहले एक कहानी सुनाती हूं। एक महिला को बेटे होने की  लालच में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छानुसार बेटा पैदा कर देती। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो रोकर दुआ करती रही। दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़​ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझकर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उनको बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई, यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनियां से चली जाती।" 

अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आंसू पोंछकर आगे कहना शुरु किया।

"अब सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनियां से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे धीरे बड़े हो गए।"

अध्यापक ने फिर कहा- "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सकें। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"

वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली -

"मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना।"

 दोस्तों, बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे में एक प्यारा सा किस्सा यह भी है कि एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था।  बेटे का हौंसला बढ़ाने के लिए वह जान बूझ कर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली- "पापा ! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूँ।"

ऐसी होती हैं बेटियां!!