एक दिन पारी आही, जाये पारी आही,
ए पिंजरा ले सुवना उड़ा के चले जाही-2
दस म छोड़े बालकपन, तीस म छोड़े जवानी,
घुमे-फिरे दौड़े नाचे-गाये, सिरा गे तोरे कहानी।
घटाही वो हा घटाही, जिये के दिन ल घटाही,
तिल-तिल बीते उमरिया, बुढ़ापा धर लाही..
तीस म पहुंचे माया के दुनिया,कोल्हू के बइला फंदागे,
तीसे पचासे कमाई के जिनगी,प्रभु भजन ल भुलागे।
ले जाही वो हा ले जाही, मरघटिया ले जाही,
पिवरा गेहे पाना ह, धीरे-धीरे. अइलाही..
गये सिराये तोर जिनगी ह, कछु तै कर नइ पाये,
हालय डोलय माटी सरीरा, मने मन.. पछताये।
रोवाही वो हा रोवाही, सबला वो रोवाही,
जेन दिन ए पिंजरा ल, छोड़के चले जाही..
पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, स/लोहारा,कबीरधाम(छ.ग)
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