का होगे कोन ल पुछंव मैहा मोर संगी कइसे उदास हे ।
हंसे न बोले हले न डोले मुर्ती पखरा के चुप चाप हे ।।
आंखी के कजरा बनके आंसू छछले हे दुनो गाल मे ।
चेहरा हंथेली मे अइसे फबे जइसे रामायण रहाल मे ।।
कइसे पढंव मोला लागत हे भरे पीरा येकर हर बात मे ।
का होगे कोन ल पुछंव
बिखरे हे केंश दुनो खांध मे जइसे घटा घनघोर हे ।
ग्रहण धरे हे मोर चंदा ल रोवथे देख चकोर रे ।।
आंखी निटोर थक हारगेंव पुन्नी के अमावस रात हे ।
का होगे कोन ल पुछंव
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