मन के बात ल मन मे राखबे
मन के होथे मरना ।
मन हा रोथे मन हा कलपथे मन ला परथे रे कहना ।।
मन कहिथे तै होते रामायण तोला मै पढ लेतेंव ।
मीरा कस तोला भजत भजत जहर प्याला पी लेतेंव ।।
मन कहिथे कहूँ होते तैं गंगा पाप के मोर हरईय्या ।
मरे के बेरा तोला गीता बरोबर सुमर सुमर सुन�लेतेंव ।।
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मंदिर के तै देबी बनते तोर चरण के बनतेव फुलवा ।
मन�कहिथे मै होतेंव चौंरा ते तुलसी के बिरवा ।।
सदा सुहागन रहिके कुँवारी बिष्णु प्रिया कहाते ।
गुड़ घीं के बन के हूंम तोर आगु म गुंगवात रहितेंव ।।
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