तोर सुरता म निंद न ई आत हे यार
मन लुहूर-तूहूर तोर डाहर दौड़े जा थे यार
का करव कैसे करव समझ न ई आथे यार
आधा रात के तोर सुरता सताथे यार
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
तोर सुरता
गज़ल
(1)
ज़ुल्म की उनकी कहानी लिख रहा हूं ,
इश्क़ भी है इक ग़ुलामी लिख रहा हूं ।
छोड़ कर जाना था तो क्यूं की मुहब्बत ,
बेवफ़ा की बदगुमानी लिख रहा हूं ।
शांत था मैं, वो सदा बेचैन रहती ,
रिश्ता अपना आग- पानी लिख रहा हूं ।
ज़िन्दगी तो यारों फ़ानी है हमारी ,
मैं मुहब्बत को भी फ़ानी लिख रहा हूं ।
मौत ,कष्टों से दिलाती मुक्ति हमको ,
बेरहम है ज़िन्दगानी लिख रहा हूं ।
दुनिया क्या जाने किसी के दर्द को तो,
अपना ग़म अपनी ज़ुबानी लिख रहा हूं ।
छीन कर सब कुछ मेरा वो जा चुकी है,
फिर भी उसका नाम दानी लिख रहा हूं ।
(2)
जागती हैं सोते सोते भी हमारी कल्पनायें,
बेवफ़ाओं ने दिया जो दर्द वो किसको बतायें ।
हम समंदर से मुहब्बत करने वाले लोग हैं तो,
क्यूं किनारों की इबादत में कभी भी सर झुकायें ।
है नहीं आसां किसी का प्यार पाना ज़िन्दगी में ,
आशिक़ी तो ,आसमानी या ख़ुदाई हैं बलाएं ।
गर अमीरी के पहाड़ों पे तुम्हें चढना है यारो,
तो ग़रीबी की ज़मीं को रोज़ ही यारो सतायें ।
गर भरोसा टूटा तो,रिश्तों में आयेंगी दरारें ,
मंदिरों में मस्जिदों में बात ये सबको बतायें ।
ज़िन्दगी के इस सफ़र में ख़ुशियां गर चिढती हैं हमसे,
तो ग़मों के कारवां से दोस्ती क्यूं ना बढायें ।
हम ग़रीबों की मदद करने में हिचके हर समय तो,
ख़ुश ख़ुदा ना होगा चाहे रोज़ ही मस्जिद में जायें ।
सोमवार, 28 नवंबर 2016
राम राम के बेरा
राम राम के बेरा हे मोर "रमा" के सुरता के घेरा हे ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
दिया बरोबर मांथा के टिकली तन मंदिर ल करे अंजोर ।
मांग के सेंदुर दग दग चमकय जइसे सुरुज भोर ।।
रुप अनुप चमकत हे सुग्घर जइसे आरती के बेरा हे ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
हंसे त ठिंन ठिंन घंटी बजे मज्जिद म होये अजान ।
पंडित के ये गीता लागे मौलवी के लागे कुरआन ।।
तोरन कस अंचरा ह ऊडे पंछी ह छोडे बसेरा ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
बोली गुरतुर हिरदे ल छुवे जस दोहा चौपाई ।
कबीर के सखी मीरा के पद उर्दू के हे रुबाई ।।
पोथी कस गठिया के धर लेंव हिरदे के मै पठेरा ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
तब तब गाँधी आथे रे
जब जब ये धरती दांव लगे ।
नरक कस गली गाँव लगे ।
बैरी मन देख गुर्राथे रे ।
पापी के पाप बढ जाथे रे ।।
तब तब एक आँधी उडाथे रे ।
तब तब एक गाँधी आथे रे ।।
जब सजा लगे जिंदगानी रे ।
करम छाँडे ये गुलामी रे ।।
मनखे बंधुवा बनिहार लगे ।
तन मन ले सबो बिमार लगे ।।
तब तब एक आँधी उडाथे रे ।
तब तब एक गाँधी आथे रे ।।
जब चारो मुँडा अंधियार लगे ।
जिनगी ह घलो दुस्वार लगे ।।
जब तन के लहु सुख जाथे रे ।
हांथ के लाठी टुट जाथे रे ।।
तब तब एक आँधी उडाथे रे ।
तब तब एक गाँधी आथे रे ।।
जब अजादी के चिरईय्या ल ।
ताकय ये पापी बिलईय्या ह ।।
पंजा म अपन दबोचय रे ।
आखा बाखा ल कोंचय रे ।।
तब तब एक आँधी उडाथे रे ।
तब तब एक गाँधी आथे रे ।।
जब आथे रे बात तिरंगा के ।
गऊ माता गीता गंगा के ।।
कोनो बेटा फाँसी चढ जाथे रे ।
शहिद के नाम जड जाथे रे ।।
तब तब एक आँधी उडाथे रे ।
तब तब एक गाँधी आथे रे ।।
इश्क ए गज़ल
इश्क ऐ वफा मे दुनिया सिमट जायेगी।
मोहब्बत मे कायनात पलट जायेगी।
बेवफाई का जाल तुम क्या बुनते हो,
ऐ मोहब्बत मूषक बन जायेगी।।
काट तेरे जाल नाम ले वफा बन।
कर युध्द जीत लेगी ये भी जंग।
मोहब्बत एक समन्दर सा दिखेगा,
जब तेरे चेहरे से नफरत की परदा हट जायेगी।।
फिर जपते फिरोगी मोहब्बत की माला।
कभी लैला तो कभी बनोगी मधुबाला।
कहोगी ये (मोहब्बत) जादुई छड़ी है,
चाहे तो दुनिया कठपुतली बन जायेगी।।
होगा शुरू दौर मोहब्बत का,
एक-दुजे के लिये ईबादत का।
खो जाओगे हसीन लम्हो मे,
तेरी नजरो से दुनिया मिट जायेगी।।
फिर होगी नजर से नजर का तकरार,
आँखो मे ही मिलेगी प्यार,
मुस्कुराहट मे उनके होगा जादु,
अब तो इशारो मे भी बात हो जायेगी।।
वो तड़प, वो चाह, वो आशाए।
अनंत उठी अब मिलन की इच्छाए।
मेल होगा जमीं आसमां का,
जब काले बादल फट जायेगी।।
बिजलिया कड़केगी, बरसात होगा,
तन्हा पंछी आजाद होगा।
प्यास मिटेगी पपीहा पंछी की,
उस पल स्वाती नक्षत्र झट जायेगी।।
🖋 पवन नेताम 'श्रीबासु'
सिल्हाटी, स/ लोहारा
कबीरधाम (छग)
गज़ल
तेरी आंखों की नदी में डूब जाना चाहता हूं ,
दर्द की लहरों से मैं रिश्ता बनाना चाहता हूं ।
तुम कहो तो जान दे दूं तुझपे दिल कुर्बान मेरा,
आशिक़ी का फ़र्ज़ मैं दिल से निभाना चाहता हूं ।
सदियों से मैं इश्क़ की कश्ती लिये तट पर खड़ा हूं ,
तुमको अपने साथ कश्ती में बिठाना चाहता हूं ।,
मैं पढ़ाई का पुजारी था बचपन से मगर अब,
प्यार का कासा जवानी में मैं पाना चाहता हूं ।
वैसे मैं ज्यादा पढा इंसां नहीं हूं दोस्तों पर,
आपसे मोहब्बत का पाठ पढ़ना चाहता हूं।
तेरी यादों के सहारे जीना मुश्क़िल है सितमगर ,
इसलिये सांसों से ही पीछा छुड़ाना चाहता हूं।
पवन नेताम 'श्रीबासु'
रविवार, 27 नवंबर 2016
श्लोक
(1) इंसान को अच्छा से और अच्छे बनने का
अनवरत प्रयास करते रहना चाहिये..।
न कि बुरा से और बुरे बनने का।।
(2) अच्छाई एक न एकदिन बुराई पर
विजय पाती है।
(3) इस दुनिया में सम्मान से जीने का सबसे।
महान तरीका है कि
हम वो बने जो हम होने का दिखावा करते है।
(4)
शनिवार, 26 नवंबर 2016
गज़ल...
जागती हैं सोते सोते भी हमारी कल्पनायें,
बेवफ़ाओं ने दिया जो दर्द वो किसको बतायें ।
हम समंदर से मुहब्बत करने वाले लोग हैं तो,
क्यूं किनारों की इबादत में कभी भी सर झुकायें ।
है नहीं आसां किसी का प्यार पाना ज़िन्दगी में ,
आशिक़ी तो ,आसमानी या ख़ुदाई हैं बलाएं ।
गर अमीरी के पहाड़ों पे तुम्हें चढना है यारो,
तो ग़रीबी की ज़मीं को रोज़ ही यारो सतायें ।
गर भरोसा टूटा तो,रिश्तों में आयेंगी दरारें ,
मंदिरों में मस्जिदों में बात ये सबको बतायें ।
ज़िन्दगी के इस सफ़र में ख़ुशियां गर चिढती हैं हमसे,
तो ग़मों के कारवां से दोस्ती क्यूं ना बढायें ।
हम ग़रीबों की मदद करने में हिचके हर समय तो,
ख़ुश ख़ुदा ना होगा चाहे रोज़ ही मस्जिद में जायें ।
(2)
ज़माना बदलता है ,पल पल बदलता रहेगा ,
मगर इश्क़ का काम बेख़ौफ़ चलता रहेगा ।
हसीनों से मेरी गुजारिश, वफ़ा तो रखें कुछ,
वफ़ाई का सम्मान हर दिल में पलता रहेगा।
वतन में मज़हबी झगड़ों से बचना होगा,
वतन अपना औरों से वरना पिछड़ता रहेगा ।
तेरे वादों को अब भी महफ़ूज़ रखता है ये दिल,
तेरा दिल दुखाना ,रगों में छलकता रहेगा ।
लुभाती हैं मुझको समंदर की लहरें हमेशा ,
सफ़ीना मेरा साहिलों पर भड़कता रहेगा ।
चुहलबाज़ी बचपन की आती मुझे याद अक्सर,
इन्हीं यादों के दम मेरा दिल बहलता रहेगा।
शराफ़त पहाड़ों की लगती है अच्छी मुझे भी,
ज़मीनी ग़ुनाहों से दिल मेरा डरता रहेगा ।
कुछ और
तेरे धवल हृदय पुहूप मे तितली सी बस जाउं ये चाहत है
तेरी महक से सुरभित मै भी हो जाउं ये चाहत है
मांग लू पनाह रब से तेरे मन की बगिया में
रंग बिरंगे सपन तेरे आँचल में देख लूं ये चाहत है..
जिनगी अनमोल हे"*
जब तक ए मानुस तन चोला हे,
जिनगी ल बने सुग्हर असन जि ले!
काली क हो जहि तेकर काहे ठिकाना,
बेरा के संगे संग जिनगी ल हांसी ठिठोली जि ले!
आँसू ख़ुशी के हों या गम के बहने दो ।
तेरे यादों को मेरे संग में रहने दो ।
अगर बेवफाई है तो प्यार नहीं
वफ़ा है तो एहसास को कहने दो ।
मैं कागज़ हो जाऊ,तू कलम हो जाये।
मैं मंजिल हो जाऊ,तू कदम हो जाये।
मैं, मैं ना रहूँ , तुम, तुम ना रहो,
आओ मिल जाये,दोनों हम हो जाये।
मुर्दा हो चुकी बस्ती से..
जिंदगी की खुशबू आ रही हैं,
वो देखो......मेरे देश में...
एक बार फिर कहीं
सोने की चिड़िया चहचहा रही हैं..
तुम पे नजरें गड़ी हैं,तमाम की
ऐसी खूबसूरती भी किस काम की।।
जिसमे शिरकत न हो जाम की
वह महफिल किस काम की।।
माना चर्चा है,चारो तरफ तेरे नाम की
पर तेरे साथ मेरा नाम न जुड़े
ऐसी चर्चा मेरे किस काम की।।
*ऐ परिंदे!!*
*यूँ ज़मीं पर बैठकर क्यों*
*आसमान देखता है..*
*पंखों को खोल, क्योंकि,*
ज़माना सिर्फ़ उड़ान देखता है !!
*लहरों की तो फ़ितरत ही है*
*शोर मचाने की..*
*लेकिन मंज़िल उसी की होती है,
जो नज़रों से तूफ़ान* *देखता है !!*
तुम्हारा साथ
तुम्हारा साथ ..
जाने क्यूँ होता है मुझको ये आभास
दूर होकर भी लगते हो तुम तो पास ।
यादें तुम्हारी है अब मधुर मधु -सी
हर लेते हो तुम तो मेरा सब संत्रास ।
तुम्हारा साथ पाकर लगता हो जैसे
जीवन हो गया मेरा बहुत कुछ खास ।
दूर और पास का अंतर हो गया गौण
तुम्हारा जो मिल गया जीवन का साथ ।
तुम्हारा साथ है मेरे लिए सुखद बड़ा
मन में भर देता है नित नये उल्लास ।
मेरा 'सपना' तो हो गया है अब सच
पतझड़ भी बन गया है अब मधुमास ।
गुरुवार, 24 नवंबर 2016
तेरी रूप,तेरी चाह
तेरी नजर से मेरी नजर का तकरार हो गया।
मेरे दिल को तुझ पर ऐतबार हो गया।
क्या ? जादू चलाई तुने नजर से,
कि, एक ही नजर मे प्यार हो गया...।।
ये होठ नही शराब की दरिया है।
जिसे देखते ही होश उड़ा जाती है।
जिसे पाते ही मदहोश हो जाती है।
उस दरिया मे डूबने के बाद,
मेरी प्यास बुझा जाती है..।।
तेरी नशीली होठ कहती है
आ छू ले मुझे...।
तेरी आँखे कहती आ पल्को पे
बिठा लू तुझे...।
तेरे धड़कते हुए दिल,
तेरी काली घटा सी बाल,
तेरे तप्त अंगार सी गाल,
तेरी चमकती हुई कानो की बाली,
ढलती पठार सा तुम्हारा वक्ष स्थल,
खंभ सी तुम्हारी ग्रीवा,
सहम ती हुई तेरी आशाए,
बिजली सी कड़कती तुम्हारी बदन,
तलाशती प्यार की निगाहे,
समेट लेने की तेरी चाह मुझे..।
ये सब पुकारती है मुझे
ये सब पुकारती मुझे...।।
बुधवार, 23 नवंबर 2016
मुक्तक
मासूमियत तुझमे है कान्हा, पर तू इतना मासूम भी नहीं, की मैं तेरे कब्जे में हूँ और तुझे
मालूम भी नही !
😭😭😭😭😭😭😭😭😭
बस मेरे प्यार की यही कहानी है………
मैंने उसे अपना सब कुछ दे दिया था दिल लगाने के बाद
मैंने अपना सब कुछ खो दिया उसके जाने के बाद.......
😭😭😭😭🙏🏼🙏🏼🙏🏼😭😭
👁👁तेरी नजरो की तीर सीधे दिल को छू जाती है....
फिर
कभी तू नजर आती है तो कभी तेरी याद सताती है....😍😍
वाह रे पताल
वाह रे पताल
वाह रे पताल तेंहा , दिखथच लाल लाल |
गुलाबी चेहरा वाली , गोरी जइसे गाल |
लाल हे पताल तेकर , लाल लाल चानी |
तोर देखे ले मुंह मा , आ जाथे पानी |
तोरे मा भरे हे , बिटामीन भरपूर |
खून के कमी ला ,भगाथच तैंहर दूर |
चटनी ला तोर देख के , मुंह मा पानी आथे |
तोर चटनी मा कतको बासी , गपागप खवाथे |
धनिया अउ मिरचा संग , अबड़ तैं मिठाथच |
लहसुन ला डार देबे , तांह ले बोंबियाथच |
सिलबट्टा के चटनी अउ ,चाउंर के चीला |
गरम गरम खा ले , सबो माई पीला |
अइसन हे गुण , तोर गरीब हे मितान |
बासी संग बिहनिया ले , खाथे किसान |
20-11-16 गजनंद साहू तिल्दा (असौंदा)
गोंदा फूल
*गोंदा फूल*
बड़ सुग्घर दिखथे गोंदा फूल,
लगथे हांसत हवए खुलखुल।
आनी बानी किसिम किसिम,
पिवरा लाली कत्था झूले झूल।
कोनो हर खोंचे रहिथे बेनी मा,
मनमोहा जाथे देखते घुलघुल।
नेता मंत्री के करथे तो सुवागत,
तर जाथे माला पहीर के कुल।
चौरा के गोंदा रसिया चलिस,
सुघर गीत ल नई सकच भूल।
मया करके दे देबे कोनो ला,
लग जाही फेर मया के हूल।
लइका मन ला गरूजी ह कथे,
जयंती बर लाहा खोज बुल।
बर कइना हर घलो पहिराथे,
गोंदा फूल पहिर रथे मिल जुल।
🙏🏻राजकिशोर धिरही🙏🏻
आँखे
👁 आँखें 👁
पहली बार खुली जब आँखें.
सब बोले देखो कैसे मटका
रही है गोल गोल आँखें।
ममतामयी माँ ने प्यार से
चूम ली आँखें।
मारे खुशी के पिता की
भर आई आँखें।
बुवा ने प्यार से काजल लगाया।
दादी ने नजर उतारी।
और पोछ ली आँखे।
आह ये प्यारी आँखें।
सुंदर आँखें।
आँखों ही आँखों मे
प्यार हुवा
और हो गई चार आँखें।
👁👁👁👁👁👁👁
श्री मती चंद्रकला त्रिपाठी।
गज़ल
वक़्त की कश्ती यूं ही चलती रहेगी ,
मुश्क़िलों से ज़िन्दगी लड़ती रहेगी ।
छांव से मेरा कोई झग़ड़ा नहीं पर ,
धूप आंगन में मेरे पलती रहेगी ।
इश्क़, क़ौमी पत्थरों से कब डरा है ,
आशिक़ी की हर नदी बहती रहेगी ।
हम पहाड़ों की इबादत भी करेंगे ,
औ ज़मीनी पूजा भी चलती रहेगी ।
दुश्मनी की धुन्ध छंट जायेगी यारों,
दोस्ती की रौशनी बढती रहेगी ।
कारखाने मुल्क में बढने लगे हैं ,
भूख़ फिर भी मुल्क में पसरी रहेगी ।
लड़कियों को मान जब तक हम न देंगे,
बेटी कोई ना कोई जलती रहेगी ।
कितना भी परदेश में हम धन कमायें,
गांव में मां बारहा रोती रहेगी ।
तेरी अदा नवम्बर की
नवंबर में एक रोज
इतवार की पहली सुबह
वो छत पर थी
मैं सड़क पर
बातें हो रही थी
चलित यंत्र दूरभाष पर
शरद का मौसम था
हल्की ठंड
कुनकुनी धूप थी
सूरज की किरण
चेहरे पर थी
कुछ देर में अब
आमने-सामने थे
मिले नयन नयनों के संग
नवंबर में एक रोज
होठों पर कली सी मुस्कान थी
लड़खड़ाते जुबान थी
अजनबियों की तरह मिले
जबकि पुरानी जान-पहचान थी
पलके उठती-झुकती
नज़र ठहरी नहीं
दो दिल जैसे
चोरी-चोरी मिल रहे थे
नवंबर में एक रोज
किश्तों में हुई मुलाकात का
ये एक सबसे हसीन अंश है
एक अनूठे रिश्ते की
सच्ची दास्ताँ
जैसे किसी ख़्वाब का
सच होना
कोई-कोई ख़्वाब
वाकई ख़्वाब नहीं रहते
जिसे सोचते है
उसे देखते नहीं
सच हो जाता
बिन देखें ही
जैसे हुआ मेरे संग
नवंबर में एक रोज
.................
गज़ल
दर्द का दरिया, मेरे भी दिल के अंदर बहता है ,
फिर भी सबके सामने वो ग़म छिपाने हंसता है ।
सुख,मुहब्बत के पहाड़ों पे खड़ा है बेझिझक,
वो ज़मीने -इश्क़ में आने से बेहद डरता है ।
उनके दिल में मेरी ख़ातिर क्या है कैसे जानूं मैं ,
उनसे ना सुनने के बदले भ्रम ही रखना अच्छा है ।
प्यार की कश्ती किनारों पे ठहरती है कहां ,
दुनिया में हर इश्क़ का मंझधार से ही रिश्ता है ।
खेले कूदें भी पढाई के अलावा बच्चे सब,
खाद पानी औ हवा से पौधा अच्छा खिलता है।
हम भी भ्रष्टाचार के आ्गे झुका देते हैं सिर ,
गोया भ्रष्टाचार का कद इंसां से भी ऊंचा है ।
मेरा, अपने भाई से झगड़ा नहीं है कोई भी,
फिर भी जाने क्यू वो हम सबसे अलग ही रहता है ।
गज़ल
ख़ुशियों का ये जहां नहीं यारों,
बादले-ग़म कहां नहीं यारों ।
हिज्र की आग है लगी हर ओर,
बस मिलन का धुआं नहीं यारों ।
जुर्म का सर उठा है हर गली में ,
न्याय का आसमां नहीं यारों ।
झूठ की घंटी बजती हर कथा में,
सच की कोई ज़ुबां नहीं यारों ।
सब हवस के फ़साने लिख रहे हैं ,
सब्र की दास्तां नहीं यारों ।
कल गुलों ने बुलाया है मुझे घर,
आजकल बाग़बां नहीं यारों ।
है ज़रूरत उसे सहारे की,
क्यूंकि उसकी भी मां नहीं यारों।
गज़ल
हमें भी गले से लगा लो,
मुहब्बत का दरिया दिखा दो ।
महक फूलों की भंवरों से है,
सभी बाग़बां को बताओ।
है गर प्यार उनसे तो,उनके
मुहल्ले में साथी तलाशो ।
मुझे चांद ने कहा कल,
अंधेरों से रिश्ता बनाओ।
पहाड़ों पे क्यूं चढते हो तुम ,
ज़मीं के तराने तो गाओ ।
बहुत क़ीमती होते आंसू,
किसी बूढे को ना सताओ ।
हो तुम चांदनी तो सुनो ये,
कभी रौशनी को भी डांटो।
*जन्मदिन कविता*
अनन्त आसमान तक चमके
आपकी ख्याती साही जी
इस धरा की पीर के आप ही
लगते गवाही जी
साहित्य के आप कर्ण धार
राष्ट्र के अनमोल कोहिनूर हो
जनम दिन की अशेष शुभकामनाएं
मुक्तक संग्रह
(1) मुर्दा हो चुकी बस्ती से........... जिंदगी
की खुशबू आ रही हैं,
वो देखो......मेरे देश में.....एक बार फिर कहीं
सोने की चिड़िया चहचहा रही हैं.....
(2) अक्श दिखा है आइने में आज फिर उनका ।
नक्शे कदम पर चलने की बारी हमारी है ।।
(3) हवाओं ने रूख बदला आज फिर से ।
न जाने आज फिर किसकी बारी है ।।
(4) पता है मुझे, तेरे बिना ही जीनी है सारी।
जिंदगी,
मग़र दिल को तेरे लौट आने का ऐतबार सा
क्यूँ है।💕
(5) महसूस कर रहे हैं तेरी लापरवाही कुछ दिनों
से, याद रखना अगर हम बदल गये तो मनाना
तेरे बस की बात नही..
(6) आँखें भिगोने लगी है अब तेरी बातें,*
*काश तुम अजनबी ही रहते तो अच्छा होता,,,
(7)भूलना भी एक नेमत है खुदा की,
वरना इंसान को पागल करदे यादें।💕
(8) मुद्दतो बाद वो मिली भी तो बैंक में,
बताओ मोहब्बत करते कि .......... नोट।
बदलते।।
(9) तेरे धवल हृदय पुहूप मे तितली सी बस जाउं
ये चाहत है
तेरी महक से सुरभित मै भी हो जाउं ये चाहत
है
मांग लू पनाह रब से तेरे मन की बगिया में
रंग बिरंगे सपन तेरे आँचल में देख लूं ये
चाहत।है..
(10) हम दुनिया को दिखाने के लिए,
नए नए रंग क्यों धरते है,
सच्चाई से तो सब वाकिफ है,
फिर हम औपचारिकताये क्यों करते।
है,
(11) कैसी बातें करते हो साहब मैं लफ़्ज़ों से भी
ना खेलूँ ,
ज़माना तो दिलों से खेलता है...
(12) अगर वो याद नहीं करते तो आप कर
लीजिये,
रिश्तें निभाते वक्त मुकाबला नहीं किया
जाता !!
(13) जिन्दगी में ऐसे शख्स को कभी मत खोना,
जिसके दिल में तुम्हारे लिए इज्जत, फिकर।
और मोहब्बत हो !!
(14) उन्हे हम याद आते है मगर फुर्सत के लम्हों
में,
मगर ये बात भी सच है की उन्हे फुर्सत नहीं
मिलती..
(15) मेरी यही आदत तुम सब को सदा याद
रहेगी-..
न शिकवा, न कोई गिला;..
जब भी मिला, मुस्कुरा के मिला....
(16) मोहब्बत की दास्ताँ लिखने का हुनर तो आ
गया,
पर महबूब को मनाने में, अब भी नाकाम
हूँ मैं..
(17) हमें लिखकर कहीं महफूज़ कर*
लीजिए*
तुम्हारी याददाश्त से निकलते*
जा रहे हैं हम....
(18) हम उनकी तस्वीरों को छुप छुप के सजाया
करते है...
कभी रखते हैं इन आँखों में, कभी दिल में
बसाया करते हैं..
(19) जिन्दगी में ऐसे शख्स को कभी मत खोना,
जिसके दिल में तुम्हारे लिए इज्जत, फिकर
और मोहब्बत हो !!
(20) कैसी बातें करते हो साहब मैं लफ़्ज़ों से भी
ना खेलूँ ,
ज़माना तो दिलों से खेलता है...
(21) ना मुमकिन है इसको समझना ®
दिल का अपना ही मिज़ाज़ होता है..!!
(22) भूलना भी एक नेमत है खुदा की,
वरना इंसान को पागल करदे यादें।
(23) आँखें भिगोने लगी है अब तेरी बातें,*
काश तुम अजनबी ही रहते तो अच्छा
होता,,
(24) रिश्ता तोडना मेरी फितरत में नहीं,
हम तो बदनाम है रिश्ता निभाने के लिये !!
(25) हवाओं ने रूख बदला आज फिर से ।
न जाने आज फिर किसकी बारी है ।।
(26) सवाल ये नहीं रफ्तार किसकी कितनी है ...*
सवाल ये है सलीक़े से कौन चलता।
है...!!
(27) कभी ना कहो कि, दिन अपने खराब है,,*
समझ लो कि हम कांटो से घिरे हुए गुलाब है
(28) बेहिसाब यादें हैं उन बीते लम्हों की,..
एक भूलने निकलूँ तो, सौ जहन में।
आतीहैं..
(29) सब कुछ मिल जाए तो जीने का क्या मज़ा,,
जीने के लिए एक की कमी भी
जरूरी है।।
(30) सिर्फ बिछड़ जाने से मोहब्बत खतम
नहीं होता
यादे भी तो होती हे *रुलाने* के लिए...
(31) लहज़ा - ए - यार में ज़हर है,
बिच्छू की तरह,
वो मुझे आप तो कहता है,
मगर तू की तरह...
(32) मोहब्बत भी ईतनी शीद्दत से करो
कि, "वो धोखा दे कर भी सोचे के
वापस जाऊ तो किस मुंह से जाऊ.. !
(33) एक अच्छा सा दे दो उन्हें भी कोई गोल्ड।
मैडल...
वो अच्छा खेल गए है
मेरी ज़िन्दगी के साथ...
(34) आईना ये बताये
कैसा है चेहरा तुम्हारा
कहां कहां लगे है दाग
कहां खूबसूरती का नजारा.
(35)
मया लगथे
अपन मया के छंईया म
तोला बईठाय के मन मोला लागथे
तोर बईहा म बईहा
लिपटे के मन मोला लागथे
सुग्हर मया के जिनगानी म
मयारु तोला बनाहुं
तोला अपन छोटकुन जिनगी म
जिनगीभर अपन बनाय के मन मोला लागथे!
पताल चटनी
बड सुघ्घर लागथे मोला,ये मौसम के पाताल चटनी
सिल के पिसौनी म हरा धनिया,कच्चा मिरचा के मतनी
बासी सन खवाय,मोला अडबड सुहाय
अंगाकर रोटी सन डोकी दाई ह जमाय
पाताल चटनी के अउ बतावव कतक किस्सा
डोकरा बबा घलो काहय,बचा दे एक कनि हिस्सा
बड सुघ्घर लागथे मोला ये मौसम के पाताल चटनी
बासी सन झडकबे बेटा,मोर दाइ के हवे कहनी..............
अश्वनी सिन्हा (कवि)
परसोदा
पीड़हा के गोठ
*पीड़हा*
तइहा जमाना मा कहां पाते खुरसी।
पीड़हा मा बईठ आगी तापे गोरसी।।
पीड़हा म बइठ के तो खावए भात।
अब आगे चलन ड्रेसिंग टेबल साथ।।
पहुना आते साट पीड़हा मंगवाए।
भर भर लोटा पहुना बर लाए।।
पीड़हा के अब ले चलन चलत हे।
लादा वाला बईठ ओनहा धोवत हे।।
पीड़हा दे के जम्मो घर करए मान।
पीड़हा बीन तो समझए अपमान।।
पीड़हा हर रहिथे पूजा चउका मा।
पीड़हा पाए बइठे मजा ठउका मा।।
पीड़हा बनवाए नीमरा लकरी के।
साल सैगोन मउहा बम्बरी के।।
मड़वा बर पीड़हा बनाए बढ़हई।
पीड़हा मा बइठ के कटे पीरा भाई।।
पवन नेताम
राजकिशोर धिरही
