मंगलवार, 29 नवंबर 2016

गज़ल

                      (1)
ज़ुल्म की उनकी कहानी लिख रहा हूं ,
इश्क़ भी है इक ग़ुलामी लिख रहा हूं ।

छोड़ कर जाना था तो क्यूं की मुहब्बत ,
बेवफ़ा की बदगुमानी लिख रहा हूं ।

शांत था मैं, वो सदा बेचैन रहती ,
रिश्ता अपना आग- पानी लिख रहा हूं ।

ज़िन्दगी तो यारों फ़ानी है हमारी ,
मैं मुहब्बत को भी फ़ानी लिख रहा हूं ।

मौत ,कष्टों से दिलाती मुक्ति हमको ,
बेरहम है ज़िन्दगानी लिख रहा हूं ।

दुनिया क्या जाने किसी के दर्द को तो,
अपना ग़म अपनी ज़ुबानी लिख रहा हूं ।

छीन कर सब कुछ मेरा वो जा चुकी है,
फिर भी उसका नाम दानी लिख रहा हूं ।

                         (2)

जागती हैं सोते सोते भी हमारी कल्पनायें,
बेवफ़ाओं ने दिया जो दर्द वो किसको बतायें ।

हम समंदर से मुहब्बत करने वाले लोग हैं तो,
क्यूं किनारों की इबादत में कभी भी सर झुकायें ।

है नहीं आसां किसी का प्यार पाना ज़िन्दगी में ,
आशिक़ी तो ,आसमानी या ख़ुदाई हैं बलाएं ।

गर अमीरी के पहाड़ों पे तुम्हें चढना है यारो,
तो ग़रीबी की ज़मीं को रोज़ ही यारो सतायें ।

गर भरोसा टूटा तो,रिश्तों में आयेंगी दरारें ,
मंदिरों में मस्जिदों में बात ये सबको बतायें ।

ज़िन्दगी के इस सफ़र में ख़ुशियां गर चिढती हैं हमसे,
तो ग़मों के कारवां से दोस्ती क्यूं ना बढायें ।

हम ग़रीबों की मदद करने में हिचके हर समय तो,
ख़ुश ख़ुदा ना होगा चाहे रोज़ ही मस्जिद में जायें ।

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