बुधवार, 23 नवंबर 2016

गज़ल

वक़्त की कश्ती यूं ही चलती रहेगी ,
मुश्क़िलों से ज़िन्दगी लड़ती रहेगी ।

छांव से मेरा कोई झग़ड़ा नहीं पर ,
धूप आंगन में मेरे पलती रहेगी ।

इश्क़, क़ौमी पत्थरों से कब डरा है ,
आशिक़ी की हर नदी बहती रहेगी ।

हम पहाड़ों की इबादत भी करेंगे ,
औ ज़मीनी पूजा भी चलती रहेगी ।

दुश्मनी की धुन्ध छंट जायेगी यारों,
दोस्ती की रौशनी बढती रहेगी ।

कारखाने मुल्क में बढने लगे हैं ,
भूख़ फिर भी मुल्क में पसरी रहेगी ।

लड़कियों को मान जब तक हम न देंगे,
बेटी कोई ना कोई जलती रहेगी ।

कितना भी परदेश में हम धन कमायें,
गांव में मां बारहा रोती रहेगी ।

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