ख़ुशियों का ये जहां नहीं यारों,
बादले-ग़म कहां नहीं यारों ।
हिज्र की आग है लगी हर ओर,
बस मिलन का धुआं नहीं यारों ।
जुर्म का सर उठा है हर गली में ,
न्याय का आसमां नहीं यारों ।
झूठ की घंटी बजती हर कथा में,
सच की कोई ज़ुबां नहीं यारों ।
सब हवस के फ़साने लिख रहे हैं ,
सब्र की दास्तां नहीं यारों ।
कल गुलों ने बुलाया है मुझे घर,
आजकल बाग़बां नहीं यारों ।
है ज़रूरत उसे सहारे की,
क्यूंकि उसकी भी मां नहीं यारों।
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