नवंबर में एक रोज
इतवार की पहली सुबह
वो छत पर थी
मैं सड़क पर
बातें हो रही थी
चलित यंत्र दूरभाष पर
शरद का मौसम था
हल्की ठंड
कुनकुनी धूप थी
सूरज की किरण
चेहरे पर थी
कुछ देर में अब
आमने-सामने थे
मिले नयन नयनों के संग
नवंबर में एक रोज
होठों पर कली सी मुस्कान थी
लड़खड़ाते जुबान थी
अजनबियों की तरह मिले
जबकि पुरानी जान-पहचान थी
पलके उठती-झुकती
नज़र ठहरी नहीं
दो दिल जैसे
चोरी-चोरी मिल रहे थे
नवंबर में एक रोज
किश्तों में हुई मुलाकात का
ये एक सबसे हसीन अंश है
एक अनूठे रिश्ते की
सच्ची दास्ताँ
जैसे किसी ख़्वाब का
सच होना
कोई-कोई ख़्वाब
वाकई ख़्वाब नहीं रहते
जिसे सोचते है
उसे देखते नहीं
सच हो जाता
बिन देखें ही
जैसे हुआ मेरे संग
नवंबर में एक रोज
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