राम राम के बेरा हे मोर "रमा" के सुरता के घेरा हे ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
दिया बरोबर मांथा के टिकली तन मंदिर ल करे अंजोर ।
मांग के सेंदुर दग दग चमकय जइसे सुरुज भोर ।।
रुप अनुप चमकत हे सुग्घर जइसे आरती के बेरा हे ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
हंसे त ठिंन ठिंन घंटी बजे मज्जिद म होये अजान ।
पंडित के ये गीता लागे मौलवी के लागे कुरआन ।।
तोरन कस अंचरा ह ऊडे पंछी ह छोडे बसेरा ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
बोली गुरतुर हिरदे ल छुवे जस दोहा चौपाई ।
कबीर के सखी मीरा के पद उर्दू के हे रुबाई ।।
पोथी कस गठिया के धर लेंव हिरदे के मै पठेरा ।
मया मे बंधाये मन जोगीया मयारु के लगाथे फेरा रे ।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें