शनिवार, 26 नवंबर 2016

गज़ल...

जागती हैं सोते सोते भी हमारी कल्पनायें,
बेवफ़ाओं ने दिया जो दर्द वो किसको बतायें ।

हम समंदर से मुहब्बत करने वाले लोग हैं तो,
क्यूं किनारों की इबादत में कभी भी सर झुकायें ।

है नहीं आसां किसी का प्यार पाना ज़िन्दगी में ,
आशिक़ी तो ,आसमानी या ख़ुदाई हैं बलाएं ।

गर अमीरी के पहाड़ों पे तुम्हें चढना है यारो,
तो ग़रीबी की ज़मीं को रोज़ ही यारो सतायें ।

गर भरोसा टूटा तो,रिश्तों में आयेंगी दरारें ,
मंदिरों में मस्जिदों में बात ये सबको बतायें ।

ज़िन्दगी के इस सफ़र में ख़ुशियां गर चिढती हैं हमसे,
तो ग़मों के कारवां से दोस्ती क्यूं ना बढायें ।

हम ग़रीबों की मदद करने में हिचके हर समय तो,
ख़ुश ख़ुदा ना होगा चाहे रोज़ ही मस्जिद में जायें ।

                      (2)

ज़माना बदलता है ,पल पल बदलता रहेगा ,
मगर इश्क़ का काम बेख़ौफ़ चलता रहेगा ।

हसीनों से मेरी गुजारिश, वफ़ा तो रखें कुछ,
वफ़ाई का सम्मान हर दिल में पलता रहेगा।

वतन में मज़हबी झगड़ों से बचना होगा,
वतन अपना औरों से वरना पिछड़ता रहेगा ।

तेरे वादों को अब भी महफ़ूज़ रखता है ये दिल,
तेरा दिल दुखाना ,रगों में छलकता रहेगा ।

लुभाती हैं मुझको समंदर की लहरें हमेशा ,
सफ़ीना मेरा साहिलों पर भड़कता रहेगा ।

चुहलबाज़ी बचपन की आती मुझे याद अक्सर,
इन्हीं यादों के दम मेरा दिल बहलता रहेगा।

शराफ़त पहाड़ों की लगती है अच्छी मुझे भी,
ज़मीनी ग़ुनाहों से दिल मेरा डरता रहेगा ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें